मेरी कैलाश मानसरोवर यात्रा:आस्था और शक्ति का दिव्य सगंम
- Sonal Goel

- Dec 11, 2025
- 16 min read
Updated: Dec 13, 2025
कभी-कभी ज़िंदगी में कुछ यात्राएँ सिर्फ किसी जगह तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं। वो हमें अपने ही अंदर की किसी मंज़िल तक ले जाती हैं। वहाँ तक, जहाँ हम खुद से मिल पाते हैं। जहाँ हमें पता चलता है कि हमारे भीतर कितना भरोसा है, कितनी सीमाएँ हैं, और उन सीमाओं के पार जाने की ताकत भी हमारे ही अंदर छिपी है।

अगस्त 2025 में की गई मेरी कैलाश मानसरोवर यात्रा मेरे जीवन का एक अनूठा अध्याय रही है। यह केवल एक तीर्थयात्रा नहीं थी, बल्कि एक ऐसी अंतरात्मा की पुकार थी जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। जीवन में कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें समझाने के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं, और महान कैलाश की ओर उठी यह पुकार मेरे लिए बिल्कुल वैसी ही थी।
अक्सर कहा जाता है कि महादेव तक पहुँचना तभी संभव होता है जब उनका बुलावा आए। 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के बाद मेरे मन में एक गहरा भाव उत्पन्न हुआ कि अब अगला कदम कैलाश मानसरोवर की ओर ही होना चाहिए। यह विश्वास और यह आस्था धीरे-धीरे एक दृढ़ संकल्प में बदल गई। माना जाता है कि जो व्यक्ति कैलाश पहुँचता है, वह शिव के परम सान्निध्य के और करीब पहुँचता है, और शायद इसी कारण यह यात्रा जितनी बाहरी होती है, उतनी ही आत्मिक और अंतर्यात्रा भी बन जाती है।
कैलाश को सनातन परंपरा में शिव का धाम माना गया है। बौद्ध मान्यताओं में इसे कांग रिनपोचे कहा जाता है, जिसका अर्थ है बहुमूल्य हिमरत्न। जैन परंपरा में यही पर्वत प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की साधना से जुड़ा हुआ है। विभिन्न परंपराओं की यह विविधता और एक ही पर्वत का तीन अलग-अलग दृष्टिकोणों में एक ही सत्य का प्रतीक बन जाना, इस यात्रा को और भी पवित्र और विशेष बनाता है।
हम सभी अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त रहते हैं, और ऐसे में कभी-कभी भीतर से एक हल्की सी आवाज़ आती है कि कुछ पल रुककर खुद से दोबारा जुड़ने की ज़रूरत है। मेरे लिए कैलाश का विचार उसी रुकने, सोचने और खुद को समझने का रास्ता बन गया।
इस यात्रा की सबसे खास बात यह रही कि मैंने इसे एक सोलो ट्रैवलर के रूप में शुरू किया। शुरुआत में मेरा इरादा कुछ लोगों के साथ जाने का था, लेकिन जब विभिन्न कारणों से उनका प्लान रुक गया, तो मुझे महसूस हुआ कि शायद मुझे यह यात्रा अकेले ही करनी चाहिए। यह जैसे एक सुंदर संकेत था—मानो महादेव स्वयं कह रहे हों कि यह मार्ग मुझे अपने संकल्प और विश्वास के साथ तय करना है।
इस निर्णय में मेरे पति श्री आदित्य यादव (IRS) तथा परिवार की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनका निरंतर समर्थन और मुझ पर उनका विश्वास देखकर मेरे मन में भी स्थिरता आई। तभी मैंने यह दृढ़ निश्चय किया कि मैं इस यात्रा को एक सोलो ट्रैवलर के रूप में पूर्ण करने का प्रयास करूँगी। मेरे मन में बस एक ही विश्वास था कि चाहे कोई साथ हो या न हो, मेरे शिव सदैव मेरे साथ हैं। इसी भरोसे ने मुझे बिना किसी झिझक के आगे बढ़ने की शक्ति दी।
आज जब मैं पीछे देखती हूँ, तो लगता है कि अकेले जाना ही इस यात्रा को सबसे खास बना गया। ऐसा लगता है कि रास्ते में प्रकृति, पहाड़, हवा और शांत माहौल मेरे साथी बन गए और हर कदम पर मेरा साथ देते रहे।
जब भी कैलाश मानसरोवर का नाम आता है, मेरे मन में यही भाव जागता है कि यह कोई साधारण यात्रा नहीं है। यह आपकी आत्मा की पुकार होती है, एक ऐसी inner calling जिसे जब सुनना होता है तो रास्ते भी अपने आप बनते चले जाते हैं। मेरे लिए यह यात्रा आत्मिक शांति, आस्था और जीवन के गहरे अर्थों को समझने का अवसर बन गई, और शायद यही इसका सबसे बड़ा उपहार है।
यात्रा की तैयारी
कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए तैयारी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। आमतौर पर जो लोग यह यात्रा करते हैं, उन्हें 3–4 महीने पहले से ही अपने शरीर पर ध्यान देना चाहिए—नियमित वॉक, हल्का व्यायाम, योग और प्राणायाम इसकी तैयारी में बहुत मदद करते हैं।
यात्रा के दौरान ऊँचाई की वजह से होने वाली जो भी शारीरिक कठिनाइयाँ होती हैं, उनमें से थोड़ी-बहुत मुझे भी महसूस हुईं, लेकिन अपने शारीरिक और मानसिक धैर्य के कारण मैंने उन मुश्किलों को पार किया।
विशेष रूप से अनुलोम–विलोम जैसे श्वास अभ्यास ऊँचाई पर बहुत सहायक रहते हैं और मन को शांत भी रखते हैं।
सामान की तैयारी भी ध्यान से करनी होती है, गर्म कपड़े, टोपी, ग्लव्ज़, ज़रूरी दवाइयाँ, ड्राई फ़्रूट्स, एनर्जी बार्स और थर्मस जैसी चीज़ें यात्रा में बहुत उपयोगी रहती हैं। रास्ते में मिलने वाले अनुभव भी बहुत कुछ सिखाते हैं। सिमिकोट में जब हमें कुछ समय रुकना पड़ा, तो सभी यात्रियों ने मिलकर वहाँ के एक सुंदर से गेस्ट हाउस में भोजन बनाया। मैं भी बाकी यात्रियों के साथ रसोई में गई और सभी के लिए चपातियाँ बनाई।
पहाड़ों के बीच बैठकर वह सादा भोजन एक अलग ही अपनापन महसूस कराता था। उस क्षण ने मुझे यह भी सिखाया कि कैलाश की यह यात्रा केवल भक्ति नहीं, बल्कि साथ चलने, सहयोग और सकारात्मक अनुभवों की यात्रा भी है।
यात्रा शुरू होने से पहले मन में जहां बहुत उत्साह था, वहीं थोड़ी झिझक भी थी। यह सोचकर कि क्या मैं इतनी कठिन राह पार कर पाऊँगी? पर भीतर कहीं एक शांत आवाज़ कहती रही कि, ‘अगर बुलावा आया है, तो रास्ता भी मिलेगा।’ और शायद यही इस यात्रा की सबसे सुंदर बात है। जब श्रद्धा सच्ची होती है, तो रास्ते अपने आप खुलने लगते हैं।
Day 1: Lucknow Arrival
मेरी यात्रा की शुरुआत लखनऊ से हुई। घर से निकलते समय मन में हल्की सी दुविधा थी, क्योंकि मैं अकेले यात्रा कर रही थी और जानती थी कि यह यात्रा काफी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। मन में कई सवाल थे, लेकिन ‘ॐ नमः शिवाय’ के पंचाक्षरी मंत्र का जाप मन को शांत और स्थिर बनाए रख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे भीतर से कोई कह रहा हो, बस विश्वास रखो, सब शुभ होगा।

हमारे समूह में 56 यात्री थे। जैसे ही मैं सब से मिली, मुझे एक परिवार जैसा माहौल महसूस हुआ। सभी यात्री एक ही आस्था और भावना के साथ कैलाश मानसरोवर के दर्शन के लिए आए थे। इसी कारण मन की सारी दुविधाएँ पल भर में दूर हो गईं और भीतर एक सुंदर विश्वास जाग गया।
लखनऊ पहुँचकर पहली बार अपने पूरे ट्रैवल ग्रुप से मुलाकात हुई। कोई बंगाल से था, कोई महाराष्ट्र से, कुछ दिल्ली और उज्जैन से आए थे, और कई यात्री बेंगलुरु से भी थे।
सच कहूँ तो, यहीं से लगा कि अब मैं ‘सोलो ट्रैवलर’ नहीं रही। इतने अलग-अलग शहरों से आए ये सभी लोग कुछ ही पलों में अपने जैसे लगने लगे। ऐसा लगा जैसे शिवजी ने खुद यह संगत तय की हो, ताकि इस पवित्र यात्रा में कोई भी अकेलापन महसूस न करे।
Day 2: Lucknow → Nepalgunj
अगली सुबह हम सड़क से नेपालगंज की ओर निकले। यह नेपाल का बॉर्डर टाउन है और कैलाश यात्रा का एक अहम पड़ाव माना जाता है। रास्ते में खेत, गाँव, और धीरे-धीरे बदलती हवा, सब कुछ जैसे यात्रा का माहौल बना रहे थे। लगभग 4 से 5 घंटे की ड्राइव के बाद हम नेपालगंज पहुँचे।
शाम को एक छोटा-सा ब्रीफ़िंग सत्र हुआ, जहाँ हमें अपनी यात्रा के अगले पड़ाव के बारे में जानकारी दी गई। यहीं से सफर का असली रोमांच शुरू हुआ। अलग-अलग प्रांतों से आए श्रद्धालु, अलग-अलग भाषाएँ, पर भावना बस एक ही, भगवान शिव के दर्शन की।
उस शाम जब सब साथ बैठे और अपने अनुभव बाँटने लगे, तो महसूस हुआ कि यह सिर्फ पहाड़ों की यात्रा नहीं, बल्कि आत्माओं का मिलन है। हर किसी के भीतर कोई अपनी ही कहानी थी, और सबकी मंज़िल एक- कैलाश पर्वत।
Day 3: Nepalgunj → Simikot
इस दिन का सफर अपने आप में एक अलग ही रोमांच लिए हुए था। सुबह हम नेपालगंज से एक चार्टर प्लेन में सवार हुए। चार्टर प्लेन में एक बार में केवल 14 यात्री ही जा सकते हैं, इसलिए हमें समूहों में बाँटा गया। कुछ ही देर में हमारी फ्लाइट ने हमें सिमिकोट पहुँचा दिया। यह स्थान समुद्र तल से लगभग 9,842 फीट की ऊँचाई पर स्थित है।

आसमान बिल्कुल साफ था, चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और नीचे एक छोटी-सी एयरस्ट्रिप। जब विमान उतरा, तो ऐसा महसूस हुआ जैसे हम बादलों के बीच उतर रहे हों। हवा ठंडी थी, लेकिन मन में एक अद्भुत शांति और उत्साह भरा हुआ था।
प्लान के अनुसार हमें आगे हेलीकॉप्टर से हिल्सा पहुँचना था, लेकिन मौसम थोड़ा बदल गया। बादल नीचे आ गए थे, इसलिए हेलीकॉप्टर उड़ नहीं सका। इसलिए हमें सिमिकोट में ही रुकना पड़ा। वहाँ एक छोटा-सा गेस्ट हाउस मिला।
हमारा वहाँ रुकना पहले से तय नहीं था, इसलिए गेस्ट हाउस में डिनर की पूरी व्यवस्था नहीं थी। सभी लोग सफर से थके हुए थे और भूख भी लगी थी, तो सबने मिलकर यह तय किया कि स्टाफ की मदद करते हुए हम खुद ही जल्दी खाना बना लेते हैं। रसोई में चूल्हा जला, और हर किसी ने अपना-अपना काम संभाल लिया। मैं भी बाकी यात्रियों के साथ किचन में गई और सबके लिए चपातियाँ बनाई। उस पल लगा कि यह यात्रा सिर्फ भक्ति की नहीं, बल्कि आपसी सहयोग और साथ मिलकर चलने की भी है।
जब सब लोग एक साथ बैठकर दाल, चावल, सब्ज़ी और गर्म चपातियाँ खा रहे थे, तो उस सादे खाने में भी एक अलग ही स्वाद था। यह स्वाद शायद इसलिए था क्योंकि यह भोजन सबने मिलकर प्यार से बनाया था।
क्योंकि यह ठहराव अनियोजित था, इसलिए मैंने इसे वहाँ के गाँव को घूमने-फिरने में इस्तेमाल किया। गाँव में घूमते समय बच्चों और गाँववालों से अच्छी बातचीत हुई। मौसम भी बहुत सुहावना था, और उनकी सादगी दिल को छू गई। वहाँ पाशुपतिनाथ मंदिर की एक छोटी-सी प्रतिकृति भी देखी। यह पूरा अनुभव इस यात्रा को और भी खास बना गया। Ji
इस दिन ने मुझे सिखाया कि कैलाश की यात्रा में सबसे बड़ी ताकत भक्ति के साथ-साथ एकता और सहयात्रियों का साथ भी है। जब सब एक-दूसरे का साथ देते हैं, तो हर रास्ता आसान हो जाता है।
Day 4: Simikot → Hilsa → Immigration
यह दिन थोड़ा लंबा था, लेकिन अपने आप में बहुत यादगार रहा। सुबह से मौसम बदल रहा था, और हेलीकॉप्टर एक बार में केवल चार यात्रियों को ले जा सकता था, इसलिए हमारे पूरे समूह को हिल्सा पहुँचने में लगभग पूरा दिन लग गया।
हिल्सा पहुँचकर महसूस हुआ कि यह स्थान बिल्कुल अलग तरह का अनुभव देता है, चारों तरफ पहाड़ी ज़मीन, ठंडी हवा और बहुत साधारण सुविधाएँ। पाँच–पाँच यात्री एक कमरे में रुके, वॉशरूम भी काफी बेसिक थे। लेकिन यही पल सिखाते हैं कि कैलाश की यात्रा आराम की नहीं, बल्कि सरलता और संयम के साथ चलने की यात्रा है।
अगले दिन इमिग्रेशन की प्रक्रिया शुरू हुई। हर बैग, हर दस्तावेज़ ध्यान से देखा जा रहा था, और हमें धैर्य के साथ अपनी बारी का इंतज़ार करना था। लेकिन किसी के चेहरे पर थकान या चिंता नहीं थी। सभी के मन में बस एक ही भाव था, कि अब हम सचमुच कैलाश के और करीब पहुँच रहे हैं।
Day 5: Acclimatization in Taklakot (Purang)
इमिग्रेशन प्रक्रिया पूरी होने के बाद हम तिब्बत के पुरांग (टकलाकोट) पहुँचे, जिसे कैलाश–मानसरोवर का गेटवे माना जाता है। यह स्थान समुद्र तल से लगभग 13,205 फीट की ऊँचाई पर है। इसलिए यहाँ एक दिन रुकना ज़रूरी था, ताकि शरीर को मौसम और ऊँचाई के अनुसार ढलने का समय मिल सके।
यह दिन थोड़ा आराम देने वाला था। सभी यात्रियों ने साथ में लोकल मार्केट देखा। कुछ लोगों ने ऊनी टोपी, गर्म कपड़े और छोटे-छोटे स्मृति चिन्ह भी खरीदे। वहाँ मौजूद डॉक्टरों ने सलाह दी कि हर किसी के पास ऑक्सीजन कैन और ज़रूरी दवाइयाँ होनी चाहिए।
शाम को जब ठंडी हवा धीरे-धीरे बह रही थी और पहाड़ों पर शांति छाई हुई थी, तो हम सब एक जगह बैठकर बातचीत करते रहे। किसी ने अपनी ज़िंदगी के अनुभव साझा किए, तो किसी ने बताया कि वह कैलाश आने के लिए क्यों प्रेरित हुआ। उसी समय महसूस हुआ कि यह यात्रा जितनी शारीरिक तैयारी मांगती है, उतनी ही मानसिक दृढ़ता भी चाहती है।
इस दिन ने मुझे एक बात और समझाई, कैलाश की राह में सबसे बड़ी ताकत न शरीर की क्षमता है, न ही कोई साधन, बल्कि धैर्य है। यही धैर्य ठंडी हवाओं में, इंतज़ार के पलों में और बदलते मौसम में मन को शांत और स्थिर बनाए रखता है।
Day 6: Taklakot → Mansarovar Lake
यह वही दिन था जिसका हर यात्री बेसब्री से इंतज़ार करता है – मानसरोवर झील के दर्शन का। Purang से हम बस द्वारा रवाना हुए। रास्ते में राक्षस ताल दिखाई दिया, जिसके बारे में कहा जाता है कि वहाँ की एनर्जी थोड़ी डिफ़रेंट होती है।

बस से परिक्रमा करते हुए जब पहली झलक मानसरोवर की मिली, तो लगा मानो सारी थकान और कठिनाइयाँ पल भर में मिट गईं। ठंडी हवाएँ, बर्फ़ से ढके पर्वतों की छाया और झील का नीलापन, वह दृश्य आत्मा तक को छू लेने वाला था। झील के किनारे बैठकर जब मैंने मानसरोवर के जल को छुआ और ध्यान लगाया, तो भीतर की सारी हलचल समाप्त हो गई। मैंने भी थोड़ा पवित्र जल अपने साथ लिया और शिव जी को अर्पित किया।
रात को डॉरमिटरी में स्टे था, जहाँ सभी यात्री एक साथ इकट्ठे हुए और सबने मिलकर भगवान की प्रार्थना की। सच कहूँ तो, वह भक्ति और सामूहिक ऊर्जा यात्रा का सबसे यादगार हिस्सा रही।
Day 7: Mansarovar → Darchen
अगली सुबह हमारी बस दर्चेन की ओर चली। यह वही जगह है जहाँ से कैलाश पर्वत की परिक्रमा शुरू होती है। छोटा-सा कस्बा, कुछ दुकानें, कुछ साधारण होटल और चारों ओर ऊँचे पहाड़। यहाँ आकर लगा कि हम सच में शिव की धरती पर हैं।
यहाँ पर एक और चुनौती का सामना करना पड़ा। जब हम यहाँ पहुँचे तो पता लगा कि होटल में कमरों की कमी है, इसलिए कुछ लोगों के लिए अच्छी क्वालिटी के टेंट का भी इंतज़ाम किया गया। मैंने टेंट में रुकने का फैसला किया, क्योंकि मैं चाहती थी कि कमरे और आराम की सुविधाएँ बुज़ुर्ग लोगों और हेल्थ इश्यू वाले लोगों को मिलें, ताकि वे पूरी तरह आराम कर सकें।
वहाँ की सादगी, ठंडी हवा और आसमान में चमकते सितारे, सब कुछ किसी ध्यान जैसा अनुभव था। उस सादे जीवन में जो शांति थी, वह शायद किसी बड़े और शानदार कमरे में भी नहीं मिल सकती।
यहीं से यात्रा का सबसे कठिन, लेकिन सबसे अर्थपूर्ण हिस्सा शुरू होता है, कैलाश परिक्रमा का। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शरीर और मन की सीमाओं की असली परीक्षा है।
रात को बैठे-बैठे गीता का श्लोक याद आया —
“आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।”
यानि मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और शत्रु भी।
और शायद यही सच्चाई इस यात्रा की हर साँस में दिखती है कि अगर मन मजबूत हो, तो आपकी विल पावर आपको हर परेशानी और हर रास्ते पर बिना घबराए चलने का साहस देती है।
Day 8: Darchen → Yama Dwar → Dirapuk (North Face Darshan)
सुबह की ठंडी हवा में हमारी यात्रा फिर शुरू हुई। पहला पड़ाव था यम द्वार, जिसे मृत्यु के देवता का द्वार कहा जाता है। परंपरा है कि यहाँ तीन बार परिक्रमा करके अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि दी जाती है। माना जाता है कि इससे अकाल मृत्यु का डर दूर हो जाता है।

वहाँ खड़े होकर जब मैंने प्रार्थना की, तो अंदर एक अलग ही विनम्रता महसूस हुई। लगा जैसे मन हल्का हो गया हो। इसके बाद लगभग 12 किलोमीटर का ट्रेक शुरू हुआ। कुछ यात्री पैदल चले, कुछ ने घोड़े का सहारा लिया। मैंने भी तय किया कि पैदल ही चलूँगी, अपने कदमों और अपने विश्वास पर भरोसा करके। मैं आमतौर पर अपने ट्रेक खुद ही करती आई हूँ, इसलिए यहाँ भी मैंने वही निर्णय लिया।
यहाँ का मौसम पल–पल बदलता है। यह बात हर यात्री को याद रखनी चाहिए। उसी हिसाब से ज़रूरी सामान साथ रखना बहुत ज़रूरी है। एक पल तेज़ बारिश होती है और अगले ही पल सूरज निकल आता है। मौसम ने हमें हर कदम पर परखा।
ट्रेकिंग के बाद वो क्षण आया जिसे मैं जीवनभर नहीं भूल पाऊँगी। पहली बार श्री कैलाश पर्वत का उत्तर मुख सामने था। मन बस ठहर गया। न कोई विचार, न कोई शब्द। भीतर सिर्फ गहरा मौन… और अपार शांति। ऐसा लगा जैसे समय रुक गया हो। उसी मौन में मानो शिव का साक्षात्कार हो रहा था।
शाम को दिरापुक में ठहराव हुआ। चारों ओर बर्फ़ से ढकी चोटियाँ और बीच में कैलाश पर्वत। वहाँ हर सांस में शिव की उपस्थिति महसूस होती थी।
Day 9: Dirapuk → Dolma La Pass → Zuthulpuk

यह दिन शायद पूरी यात्रा का सबसे कठिन, लेकिन सबसे पवित्र दिन था। सुबह जब अँधेरा पूरी तरह छटा भी नहीं था, हम लगभग 22 किलोमीटर लंबे इस कठिन ट्रेक की सबसे चुनौतीपूर्ण चढ़ाई—डोलमा ला पास—की ओर बढ़ने लगे, जो लगभग 18,471 फीट की ऊँचाई पर स्थित है।
हर कदम पर हवा और पतली होती जा रही थी। साँसें भारी, और शरीर अपनी सीमा महसूस कर रहा था। बर्फ़ से ढके, पत्थरीले रास्तों पर चलते हुए कई बार लगा कि शायद अब आगे नहीं बढ़ पाऊँगी। लेकिन हर बार अंदर से एक आवाज़ आती थी—“बस एक कदम और…
कहा जाता है कि डोलमा ला पास का संबंध माता पार्वती से है और इसे यात्रा का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। जैसे-जैसे हम ऊपर पहुँचते गए, श्रद्धा और गहरी होती गई। वहाँ पहुँचकर जो महसूस हुआ, उसे शब्दों में कहना मुश्किल है—भीतर शांति, आँखों में हल्की नमी, और दिल में कृतज्ञता।
पास पार करने के बाद नीचे उतरते समय गौरीकुंड के दर्शन हुए। बर्फ़ के बीच शांत, चमकता हुआ वह छोटा-सा कुंड ऐसा लग रहा था मानो माता पार्वती वहीं ध्यान में हों। उस दृश्य ने थकान की जगह अंदर एक नई ऊर्जा भर दी।
शाम तक हम ज़ुथुलपुक पहुँचे। वहाँ एक साधारण-सी डॉरमिटरी में रात गुज़ारनी थी। सबके चेहरों पर थकान साफ़ नजर आ रही थी, लेकिन आँखों में सुकून था। कोई ज़्यादा बात नहीं कर रहा था—हर कोई बस अपने भीतर इस अनुभव को महसूस कर रहा था।
उस रात नींद गहरी थी, लेकिन उससे भी गहरी थी वह शांति, जो इस सफर ने मन में उतारी थी।
Day 10: Zuthulpuk → Darchen → Hilsa
सुबह जब यात्रा के आखिरी चरण की शुरुआत हुई, तो मन में मिले-जुले भाव थे। एक ओर यह राहत थी कि परिक्रमा अब पूरी होने वाली है, और दूसरी ओर एक हल्की-सी उदासी कि इतने गहरे अनुभवों से भरा यह सफर अब समाप्त हो रहा है। इस अंतिम दिन का ट्रेक कुल 10 किलोमीटर का था, लेकिन मन और शरीर दोनों ही अब पहले से हल्के महसूस हो रहे थे।
हम ज़ुथुलपुक से दर्चेन लौटे, और वहाँ से गाड़ियों द्वारा शेर होते हुए हिल्सा की ओर बढ़े। पूरे रास्ते कैलाश पर्वत बार-बार दिखाई देता रहा, कभी धूप में चमकता हुआ, तो कभी बादलों में शांत-सा छिपा हुआ। हर बार उसे देखकर महसूस होता रहा कि यह यात्रा सिर्फ शरीर की नहीं थी, बल्कि भीतर की आत्मा की भी थी।
जब हम सीमा के करीब पहुँचे, तो मैंने आखिरी बार मुड़कर कैलाश की ओर देखा। पूरी परिक्रमा के ये 42 किलोमीटर मानो किसी बाहरी यात्रा से अधिक एक भीतर की तीर्थयात्रा रहे हों। ऐसा महसूस हुआ जैसे वह मौन पर्वत कह रहा हो,
अब लौट जाओ… जिसके लिए आए थे, वह तुम्हें अपने भीतर ही मिल चुका है।
Day 11: Hilsa → Simikot → Nepalganj → Lucknow

सुबह हम हिल्सा से हेलीकॉप्टर में सवार हुए। कुछ दिन पहले यही रास्ता कितना कठिन लगता था, और आज ऐसा महसूस हो रहा था जैसे पहाड़ अपने आशीर्वाद के साथ हमें विदा कर रहे हों।
हेलीकॉप्टर से हम सिमिकोट पहुँचे। यहाँ से नेपालगंज के लिए चार्टर फ्लाइट थी, लेकिन मौसम खराब होने की वजह से फ्लाइट में काफ़ी देरी हो गई। चार्टर प्लेन में एक बार में बहुत कम यात्री जा सकते थे, इसलिए पहले महिलाओं और वरिष्ठ यात्रियों को भेजा गया। मैं भी उसी सूची में थी, इसलिए मुझे नेपालगंज पहुँचने का मौका मिल गया।
लेकिन हमारे कई साथी तेज़ हवा और खराब मौसम के कारण सिमिकोट में ही रुक गए। उनके लिए वहाँ तुरंत स्टे की व्यवस्था की गई। परिस्थिति कठिन थी, लेकिन सभी ने धैर्य बनाए रखा—जैसे कैलाश हमें सिखाता है कि हर कदम अपने समय पर ही आगे बढ़ता है।
नेपालगंज पहुँचकर मौसम की गर्माहट और शहर की हलचल कुछ अजीब लगी। मन अभी भी पहाड़ों की शांति में ही अटका हुआ था। नेपालगंज से आगे का सफर सड़क मार्ग से था, और मौसम व देरी की वजह से इस दिन का ज़्यादातर समय सिर्फ ट्रैवलिंग में ही निकल गया।
लखनऊ पहुँचते-पहुँचते काफी देर रात हो चुकी थी। पूरे दिन की यात्रा ने शरीर थका दिया था, लेकिन मन में अब भी वही शांति, वही सुकून, और कहीं न कहीं वह हल्का-सा खालीपन बना हुआ था—जैसे मन अब भी उस मौन पर्वत और नीली झील के सामने शांत बैठा हो।
Day 12: Lucknow → Delhi / Home
अगले दिन लखनऊ से दिल्ली की यात्रा थी। यह सफर सीधा और शांत था, लेकिन मन लगातार उसी अनुभव को दोहराता रहा।सोचती रही, इस पूरी यात्रा ने मुझे क्या दिया?शायद यही कि शरीर थकता है, रास्ते कठिन होते हैं, मौसम कभी साथ देता है, कभी चुनौती बन जाता है… पर आस्था, धैर्य और मन का संतुलन आपको हर कदम आगे बढ़ाते रहते हैं।
कैलाश की यात्रा खत्म हो गई थी, लेकिन उसके प्रभाव, वो शांति, वो मौन, वो एहसास—अब मेरे भीतर हमेशा के लिए ठहर चुके थे। कैलाश की यात्रा ने मुझे यह भी सिखाया कि हम चाहे कितनी भी तैयारी कर लें, असली नियंत्रण प्रकृति और नियति के हाथों में ही होता है। और जब हम इसे स्वीकार कर लेते हैं, तब हर कठिनाई हल्की लगने लगती है।
इस सफर की तस्वीरें, वीडियो या नोट्स तो समय के साथ धुंधले हो सकते हैं, पर वह शांति जो मानसरोवर के किनारे बैठकर महसूस हुई, वह मौन जो कैलाश के उत्तर मुख को देखकर भीतर उतरा, और वह अनुभूति जो डोलमा ला पास पर मिली—वो सब हमेशा के लिए दिल में दर्ज हो गए हैं।
अब जब मैं घर लौट रही थी, तो ऐसा लग रहा था जैसे कैलाश ने मेरे भीतर कुछ बदल दिया है। एक हल्कापन, एक अपनापन, और एक गहरा विश्वास कि जिस राह पर भी चलो, अगर मन साफ है और कदम सच्चे हैं, तो मंज़िल अपने आप रास्ता दिखा देती है। और शायद यही इस यात्रा की सबसे बड़ी सीख है—कैलाश मानसरोवर तक पहुँचने से ज़्यादा ज़रूरी है उस दिव्य ऊर्जा को अपने भीतर महसूस करना।
मेरी यात्रा तो Day 12 पर समाप्त हो गई, लेकिन हमारे साथ के कई यात्रियों की यात्रा Day 13 पर जाकर पूरी हुई, क्योंकि मौसम खराब होने के कारण उन्हें सिमिकोट में रुकना पड़ा। तब समझ आया कि यह यात्रा कभी–कभी अनिवार्य परिस्थितियों की वजह से बढ़ भी जाती है—और यह भी उसी अनुभव का हिस्सा है।
दिव्य अनुभव
जब पहली बार कैलाश पर्वत सामने दिखाई दिया, तो कुछ क्षण के लिए मन बिल्कुल शांत हो गया। सामने बर्फ़ से ढकी हुई विशाल चोटी थी, लेकिन महसूस ऐसा हुआ जैसे वहाँ सिर्फ़ एक पर्वत नहीं, बल्कि खुद महादेव का आशीर्वाद खड़ा हो। यह एक ऐसा दृश्य था जो शब्दों में बताना मुश्किल है, आँखों से ज़्यादा यह मन में उतरता है, और भीतर एक अलग ही शांति देता है।

मानसरोवर झील का अनुभव भी उतना ही खास था। जैसे ही झील की पहली झलक मिली, कई दिनों की सारी थकान एकदम हल्की लगने लगी। झील का साफ नीला पानी, उसके आसपास के पर्वत, और ठंडी हवा, यह सब मिलकर मन को बहुत शांत कर रहे थे।
झील के किनारे बैठकर जब पवित्र जल को छुआ और आँखें बंद कीं, तो ऐसा लगा जैसे भीतर की सारी बेचैनी खत्म हो रही हो। मैंने वहाँ जल अर्पित किया और थोड़ा पवित्र जल अपने साथ भी रखा। यह पल बहुत निजी था, ऐसा लगा जैसे मन और शिव के बीच एक शांत संवाद चल रहा हो।
यात्रा का अनुभव और धन्यवाद
इस पूरी यात्रा को याद करती हूँ तो सबसे पहले मन में आभार ही आता है। आभार उस अदृश्य शक्ति का, जिसने मुझे बुलाया, रास्ता आसान किया और हर कठिन मोड़ पर साथ दिया। आभार अपने सहयात्रियों का, जो हर कदम पर परिवार की तरह साथ रहे। आभार उन गाइड्स और टीम लीडर्स का, जिनकी वजह से यह कठिन मार्ग थोड़ी सरल लगने लगी।

यह सच है कि कैलाश मानसरोवर की यात्रा कभी अकेले पूरी नहीं होती। इसे सफल बनाती है सामूहिक ऊर्जा, साथ चलने वाले कदम और सबसे बढ़कर—अटूट आस्था।
इस यात्रा को पूर्ण करने में मेरे परिवार का अत्यंत महत्वपूर्ण सहयोग रहा। मेरे पति और मेरे दोनों बच्चों तथा मेरे पूरे परिवार ने मुझे इस यात्रा पर जाने के लिए बहुत प्रेरित किया। वे बारह दिनों तक मेरी अनुपस्थिति में घर की सभी ज़िम्मेदारियाँ संभालते रहे। यात्रा पूरी कर जब मैं वापस लौटी, तो उन्होंने फूलों की माला पहनाकर जिस स्नेह और आत्मीयता से मेरा स्वागत किया, वह मेरे लिए एक अत्यंत प्लेज़न्ट सरप्राइज़ था।
अगर आप यह ब्लॉग पढ़ रहे हैं, तो मैं बस इतना कहना चाहूँगी कि कैलाश मानसरोवर कोई साधारण यात्रा नहीं है। यह आत्मा को जगाने वाला अनुभव है—एक ऐसी यात्रा, जहाँ इंसान खुद से मिलता है और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखना सीखता है।
और सबसे खास बात—यह अनुभव महादेव ने मुझे दिया। इसके लिए मैं जीवन भर आभारी रहूँगी। मेरी इच्छा है कि एक दिन मैं यह अनुभव अपने परिवार के साथ भी कर सकूँ—अपने बच्चों, अपने पति और अपने पूरे परिवार के साथ। हर कदम पर महादेव की कृपा बनी रहे।
कैलाश मानसरोवर देखा नहीं जाता, इसे बस महसूस किया जाता है
हर हर महादेव!
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Ek solo yatri ke roop mein yeh yatra poori karna apne aap mein prerna dene wali hai.
Aapki aastha aur dridh sankalp ko naman. Har Har Mahadev 📿🙏
Very well written ma'am. I was thinking about planning the Yatra but had so many doubts. Now, I can plan things clearly. Thanks a lot for sharing your experience.
Aapki Kailash Yatra ki kahani ne heart aur soul dono ko touch kiya. Thank you for sharing this experience. 🙌
बहुत ही सुंदर लेख लिखा है! आपकी यात्रा सिर्फ एक ट्रिप नहीं, बल्कि आत्मा की खोज की प्रेरणा देती है।